घराचा शिल्पकार
देते आकार
स्त्री वीणा नाही
घराला घरपण
मिळे दर्पण
चोवीस तास
करते स्त्री नोकरी
घर चाकरी
घराची लक्ष्मी
ती हाऊस वाईफ
जगते लाईफ
चल रही है परिस्थिती आपके विरुद्ध तो चलने दो बह रहा है पानी तो बेशक उसे बहने दो आएगा समय तेरा भी ढल रहा है दीन तो ढलने दो... हर रात के बाद ...
No comments:
Post a Comment